श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.177.21 
अहो नु मम बालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव।
किं नैवं जातु पुरुष: परेषां प्रेष्यतामियात् ॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अहा! यह मेरी क्या मूर्खता है कि मैं आपके हाथों का खिलौना बन गया हूँ। यदि ऐसा न होता, तो क्या कोई समझदार व्यक्ति कभी दूसरों की दासता स्वीकार करता?॥21॥
 
‘Oh! What foolishness is this of mine that I have become a toy in your hands. If this were not the case, would any sensible person ever accept the slavery of others?॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)