श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.177.2 
भीष्म उवाच
सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत।
निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नर:॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - हे भारत! सबमें समता का भाव, व्यर्थ परिश्रम का अभाव, सत्यभाषण, संसार से विरक्ति और कर्म-वासना का अभाव - ये पाँचों गुण जिस पुरुष में विद्यमान हैं, वही सुखी है॥2॥
 
Bhishmaji said – India! A sense of equality in all, absence of useless labour, speaking the truth, detachment from the world and absence of lust for action - the person who has all these five is happy. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)