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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 17
श्लोक
12.177.17
नान्तं सर्वविधित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन।
शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते॥ १७॥
अनुवाद
‘धन आदि की समस्त प्रवृत्तियों का अन्त कोई भी कभी नहीं कर सका है। केवल मूर्ख मनुष्य का शरीर और जीवन का लोभ बढ़ता है।॥17॥
‘No one has ever been able to put an end to all the tendencies for wealth etc. Only a foolish person's greed for body and life increases.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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