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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 15
श्लोक
12.177.15
अहो सम्यक् शुकेनोक्तं सर्वत: परिमुच्यता।
प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात्॥ १५॥
अनुवाद
अहा! शुकदेव मुनि ने जनक के महल से निकलकर विशाल वन में जाते समय क्या ठीक कहा कि मैं समस्त बंधनों से मुक्त हो गया हूँ?॥15॥
'Aha! How well did the sage Shukdev say while leaving Janaka's palace for the vast forest that he was free from all bonds?॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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