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mahabharat 12.176.8: इस संसार में दरिद्रता ही एकमात्र सुख है। वह कल्याणकारी, कल्याणकारी और सुरक्षित है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार के शत्रु का भय नहीं है। वह दुर्लभ होने पर भी सुगमता से प्राप्त होने वाली है।॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.176.8 
आकिंचन्यं सुखं लोके पथ्यं शिवमनामयम्।
अनमित्रपथो ह्येष दुर्लभ: सुलभो मत:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में दरिद्रता ही एकमात्र सुख है। वह कल्याणकारी, कल्याणकारी और सुरक्षित है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार के शत्रु का भय नहीं है। वह दुर्लभ होने पर भी सुगमता से प्राप्त होने वाली है।॥8॥
 
‘In this world, poverty is the only happiness. It is beneficial, beneficial and safe. There is no threat of any kind of enemy on this path. It is easy to attain even though it is rare. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)