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mahabharat 12.175.7: पुत्र ने कहा - पिताजी ! जब यह संसार मृत्यु से मारा जा रहा है, बुढ़ापे से घिरा हुआ है, दिन-रात आयु को क्षीण करने का कार्य करते हुए सफलतापूर्वक व्यतीत हो रहे हैं - ऐसी स्थिति में आप इतने धैर्यपूर्वक कैसे बात कर रहे हैं?   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.175.7 
पुत्र उवाच
एवमभ्याहते लोके समन्तात् परिवारिते।
अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
पुत्र ने कहा - पिताजी ! जब यह संसार मृत्यु से मारा जा रहा है, बुढ़ापे से घिरा हुआ है, दिन-रात आयु को क्षीण करने का कार्य करते हुए सफलतापूर्वक व्यतीत हो रहे हैं - ऐसी स्थिति में आप इतने धैर्यपूर्वक कैसे बात कर रहे हैं?
 
The son said - Father! When this world is being killed by death, surrounded by old age, days and nights are successfully passing by doing the work of shortening lifespan - in such a situation, how are you talking so patiently?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)