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mahabharat 12.175.6: पिता ने कहा - बेटा! द्विज को पहले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिए; फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके अपने पितरों के उद्धार के लिए पुत्र प्राप्ति की इच्छा करनी चाहिए। विधिपूर्वक तीन प्रकार की अग्नियों की स्थापना करके यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए। तत्पश्चात वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। तत्पश्चात मौन रहकर संन्यासी होने की इच्छा करनी चाहिए। 6॥   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.175.6 
पितोवाच
वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्र
पुत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम्।
अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो
वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पिता ने कहा - बेटा! द्विज को पहले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिए; फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके अपने पितरों के उद्धार के लिए पुत्र प्राप्ति की इच्छा करनी चाहिए। विधिपूर्वक तीन प्रकार की अग्नियों की स्थापना करके यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए। तत्पश्चात वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। तत्पश्चात मौन रहकर संन्यासी होने की इच्छा करनी चाहिए। 6॥
 
The father said – Son! A Dwija should first observe the vow of celibacy and study the entire Vedas; Then after entering Grihastha Ashram, he should desire to have a son for the salvation of his ancestors. Perform the rituals of Yagya by establishing three types of fires in a proper manner. After that enter Vanaprastha Ashram. After that, while remaining silent, one should wish to become a Sanyasi. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)