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mahabharat 12.175.37: भगवान के साथ एकता और समता, सत्य भाषण, सदाचार, ब्रह्मभक्ति, दण्ड का त्याग (अहिंसा), सरलता और सभी प्रकार के सकाम कर्मों की अधिकता - इनके समान ब्राह्मण के लिए दूसरा कोई धन नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.175.37 
नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं
यथैकता समता सत्यता च।
शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं
ततस्ततश्चोपरम: क्रियाभ्य:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
भगवान के साथ एकता और समता, सत्य भाषण, सदाचार, ब्रह्मभक्ति, दण्ड का त्याग (अहिंसा), सरलता और सभी प्रकार के सकाम कर्मों की अधिकता - इनके समान ब्राह्मण के लिए दूसरा कोई धन नहीं है।
 
Unity and equality with God, truthful speech, virtuous conduct, devotion to Brahman, renunciation of punishment (non-violence), simplicity and exceeding all kinds of fruitful deeds - there is no other wealth for a Brahmin like these.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)