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mahabharat 12.175.33: मेरे जैसा विद्वान् पुरुष नाशवान फल देने वाले हिंसक पशुयज्ञों को तथा भूतों के समान अपने ही शरीर के मांस और रुधिर से किए जाने वाले तामस यज्ञों को कैसे कर सकता है?॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.175.33 
पशुयज्ञै: कथं हिंस्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति।
अन्तवद्भिरिव प्राज्ञ: क्षेत्रयज्ञै: पिशाचवत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मेरे जैसा विद्वान् पुरुष नाशवान फल देने वाले हिंसक पशुयज्ञों को तथा भूतों के समान अपने ही शरीर के मांस और रुधिर से किए जाने वाले तामस यज्ञों को कैसे कर सकता है?॥ 33॥
 
How can a learned person like me perform the violent animal sacrifices which yield perishable results, and the Tamasic sacrifices which are performed with the flesh and blood of one's own body, like those of ghosts?॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)