Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.175.32: मैं संन्यास लेकर शान्त यज्ञ करने में तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियों को वश में रखकर ब्रह्मयज्ञ (वेदों और शास्त्रों का स्वाध्याय) में लगूँगा और संन्यासी के रूप में रहूँगा। उत्तरायण के मार्ग से जाने के लिए वाग्यज्ञ रूपी जप और स्वाध्याय, मनोयज्ञ रूपी ध्यान और अग्निहोत्र रूपी गुरुशुश्रूषादि रूपी कर्मयज्ञ का अनुष्ठान करूँगा। 32॥ | mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मैं संन्यास लेकर शान्त यज्ञ करने में तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियों को वश में रखकर ब्रह्मयज्ञ (वेदों और शास्त्रों का स्वाध्याय) में लगूँगा और संन्यासी के रूप में रहूँगा। उत्तरायण के मार्ग से जाने के लिए वाग्यज्ञ रूपी जप और स्वाध्याय, मनोयज्ञ रूपी ध्यान और अग्निहोत्र रूपी गुरुशुश्रूषादि रूपी कर्मयज्ञ का अनुष्ठान करूँगा। 32॥
Having retired, I will be ready to perform a peaceful yajna, keeping my mind and senses under control, I will engage in Brahmayagya (self-study of the Vedas and scriptures) and will remain as a monk. To go through the path of Uttarayan, I will perform the rituals of Japa and Swadhyay in the form of Vaagyagya, meditation in the form of Manoyagya and Agnihotra and Karmayagya in the form of Gurushushrushadi. 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥