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mahabharat 12.175.27: जो मनुष्य मन, वाणी और शरीर से प्राणियों को कष्ट नहीं पहुँचाता, उसे प्राण और धन का नाश करने वाले हिंसक प्राणी भी कष्ट नहीं पहुँचाते ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.175.27 
न हिंसयति यो जन्तून् मनोवाक्कायहेतुभि:।
जीवितार्थापनयनै: प्राणिभिर्न स हिंस्यते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य मन, वाणी और शरीर से प्राणियों को कष्ट नहीं पहुँचाता, उसे प्राण और धन का नाश करने वाले हिंसक प्राणी भी कष्ट नहीं पहुँचाते ॥27॥
 
A man who does not harm living beings with the help of his mind, speech and body, is also not harmed by the violent creatures who destroy his life and wealth. ॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)