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न हिंसयति यो जन्तून् मनोवाक्कायहेतुभि:।
जीवितार्थापनयनै: प्राणिभिर्न स हिंस्यते॥ २७॥
अनुवाद
जो मनुष्य मन, वाणी और शरीर से प्राणियों को कष्ट नहीं पहुँचाता, उसे प्राण और धन का नाश करने वाले हिंसक प्राणी भी कष्ट नहीं पहुँचाते ॥27॥
A man who does not harm living beings with the help of his mind, speech and body, is also not harmed by the violent creatures who destroy his life and wealth. ॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥