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mahabharat 12.175.19: जब तक मनुष्य सुखों से संतुष्ट नहीं होता और संग्रह करता रहता है, तब तक मृत्यु आकर उसे ले जाती है, जैसे बाघ किसी जानवर को ले जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.175.19 
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम्।
व्याघ्र: पशुमिवादाय मृत्युरादाय गच्छति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जब तक मनुष्य सुखों से संतुष्ट नहीं होता और संग्रह करता रहता है, तब तक मृत्यु आकर उसे ले जाती है, जैसे बाघ किसी जानवर को ले जाता है।
 
As long as a man is not satisfied with pleasures and keeps on collecting, death comes and takes him away, just like a tiger takes away an animal.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)