Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.175.10: ये अचूक रात्रियाँ तो प्रतिदिन आती-जाती रहती हैं। जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु एक क्षण भी प्रतीक्षा नहीं कर सकती और मैं उसके जाल में फँसा हुआ घूम रहा हूँ, तो फिर मैं थोड़ी देर भी कैसे प्रतीक्षा कर सकता हूँ?॥10॥ | mahabharat अध्याय 12.175: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अमोघा रात्रयश्चापि नित्यमायान्ति यान्ति च।
यदाहमेतज्जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह।
सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये जालेनापिहितश्चरन्॥ १०॥
अनुवाद
ये अचूक रात्रियाँ तो प्रतिदिन आती-जाती रहती हैं। जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु एक क्षण भी प्रतीक्षा नहीं कर सकती और मैं उसके जाल में फँसा हुआ घूम रहा हूँ, तो फिर मैं थोड़ी देर भी कैसे प्रतीक्षा कर सकता हूँ?॥10॥
These infallible nights come and go every day. When I know that death cannot wait even for a moment and I am moving around trapped in its net, then how can I wait even for a little while?॥10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥