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mahabharat 12.174.61: कभी-कभी भाग्यवश या पूर्व शुभ कर्मों के प्रभाव से अनर्थ भी अर्थ में बदल जाता है, जिससे आज मैं निराश होकर सद्ज्ञान से युक्त हो गया हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रहा। 61॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  12.174.61 
अनर्थो हि भवेदर्थो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
सम्बुद्धाहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिया॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी भाग्यवश या पूर्व शुभ कर्मों के प्रभाव से अनर्थ भी अर्थ में बदल जाता है, जिससे आज मैं निराश होकर सद्ज्ञान से युक्त हो गया हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रहा। 61॥
 
Sometimes, due to luck or the influence of previous auspicious deeds, even disaster turns into meaning, due to which today, after being disappointed, I have become full of good knowledge. Now I am no longer an Ajitendriya. 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)