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mahabharat 12.174.55: जो वस्तु वृद्ध होने पर भी कभी पुरानी नहीं होती तथा जो रोग के समान जीवन के साथ-साथ रहती है, उसे छोड़ना मिथ्या बुद्धि वालों के लिए कठिन है; जो इस इच्छा को त्याग देता है, वही सुख प्राप्त करता है ॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.174.55 
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत:।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जो वस्तु वृद्ध होने पर भी कभी पुरानी नहीं होती तथा जो रोग के समान जीवन के साथ-साथ रहती है, उसे छोड़ना मिथ्या बुद्धि वालों के लिए कठिन है; जो इस इच्छा को त्याग देता है, वही सुख प्राप्त करता है ॥ 55॥
 
It is difficult for those with a wrong intellect to give up that which never becomes old even when the person grows old, and which remains like a disease that goes along with the life; only he who gives up this desire, attains happiness. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)