Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.174.51: जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह जीव अपनी समस्त इच्छाओं को समेट लेता है, तब यह अपने शुद्ध अन्तःकरण में स्वयं प्रकाशस्वरूप परब्रह्म को अनुभव करता है ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.174.51 
यदा संहरते कामान् कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:।
तदाऽऽत्मज्योतिरात्मायमात्मन्येव प्रपश्यति॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह जीव अपनी समस्त इच्छाओं को समेट लेता है, तब यह अपने शुद्ध अन्तःकरण में स्वयं प्रकाशस्वरूप परब्रह्म को अनुभव करता है ॥ 51॥
 
Just as a tortoise withdraws its limbs from all sides, similarly when this living being withdraws all its desires, then it realises the Supreme Being in the form of light itself in its pure conscience. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)