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mahabharat 12.174.27: हे प्रभु! यहाँ पुत्र, धन, परिवार और बन्धु-बान्धवों के नष्ट हो जाने पर सब लोग दावानल की तरह महान दुःख का अनुभव करते हैं; किन्तु सुख-दुःख, जन्म-मरण आदि सब भाग्य के अधीन हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.174.27 
पुत्रनाशे वित्तनाशे ज्ञातिसम्बन्धिनामपि।
प्राप्यते सुमहद् दुखं दावाग्निप्रतिमं विभो।
दैवायत्तमिदं सर्वं सुखदु:खे भवाभवौ॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! यहाँ पुत्र, धन, परिवार और बन्धु-बान्धवों के नष्ट हो जाने पर सब लोग दावानल की तरह महान दुःख का अनुभव करते हैं; किन्तु सुख-दुःख, जन्म-मरण आदि सब भाग्य के अधीन हैं।
 
O Lord! Here everyone experiences great sorrow like the burning fire of a forest fire when their son, wealth, family and relatives are destroyed; however, happiness and sorrow, birth and death etc. are all dependent on destiny.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)