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mahabharat 12.174.25: मनुष्य अपनी स्त्री, पुत्र आदि तथा परिवार के लिए चोरी आदि पाप संचित करता है; परंतु इस लोक और परलोक में उन सब कर्मों का दुःखदायी फल उसे ही भोगना पड़ता है ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.174.25 
संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नर:।
एक: क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानव:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपनी स्त्री, पुत्र आदि तथा परिवार के लिए चोरी आदि पाप संचित करता है; परंतु इस लोक और परलोक में उन सब कर्मों का दुःखदायी फल उसे ही भोगना पड़ता है ॥25॥
 
Man accumulates sins like theft etc. for his wife, son etc. and family; But in this world and the next world he alone has to suffer the painful consequences of all those deeds. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)