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mahabharat 12.174.2: भीष्मजी बोले- युधिष्ठिर! वेदों में सर्वत्र स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाले और समस्त आश्रमों का सच्चा फल देने वाले तप का उल्लेख है। धर्म के अनेक द्वार हैं। संसार में ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसका कोई फल न हो॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.174.2 
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्म: स्वर्ग्य: सत्यफलं तप:।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- युधिष्ठिर! वेदों में सर्वत्र स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाले और समस्त आश्रमों का सच्चा फल देने वाले तप का उल्लेख है। धर्म के अनेक द्वार हैं। संसार में ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसका कोई फल न हो॥ 2॥
 
Bhishmaji said-Yudhishthira! Everywhere in the Vedas, there is mention of penance that leads to heaven and gives the true fruit to all the ashrams. There are many doors of religion. There is no such action in the world that does not have any fruit.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)