श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  » 
 
 
अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन
 
श्लोक 1:  राजा युधिष्ठिर ने कहा- पितामह! अब तक आपने राजकर्म सम्बन्धी उत्तम धर्मों का उपदेश किया है। पृथ्वीनाथ! अब आप आश्रमवासियों के उत्तम धर्म का वर्णन कीजिए।॥1॥
 
श्लोक 2:  भीष्मजी बोले- युधिष्ठिर! वेदों में सर्वत्र स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाले और समस्त आश्रमों का सच्चा फल देने वाले तप का उल्लेख है। धर्म के अनेक द्वार हैं। संसार में ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसका कोई फल न हो॥ 2॥
 
श्लोक 3:  हे भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य जिस विषय में भी दृढ़ निश्चय कर लेता है (जिससे उसे अभीष्ट की प्राप्ति निश्चित हो जाती है), वह उसी को अपना कर्तव्य समझता है, अन्य किसी विषय को नहीं॥3॥
 
श्लोक 4:  जैसे-जैसे मनुष्य संसार के पदार्थों को व्यर्थ समझता है, वैसे-वैसे उनसे उसकी विरक्ति बढ़ती जाती है; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥4॥
 
श्लोक 5:  युधिष्ठिर! यह संसार अनेक दोषों से युक्त है, ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष को अपने मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए ॥5॥
 
श्लोक 6:  युधिष्ठिर ने पूछा - "पितामह! जब धन नष्ट हो जाए, पत्नी, पुत्र या पिता की मृत्यु हो जाए, तो मनुष्य को अपने शोक से कैसे उबरना चाहिए?" कृपया मुझे यह बताइए।
 
श्लोक 7:  भीष्म बोले, "पुत्र! जब धन का नाश हो जाए अथवा स्त्री, पुत्र या पिता की मृत्यु हो जाए, तब 'हाय! यह संसार कितना दुःखमय है' ऐसा विचार करके मनुष्य को शोक दूर करने के लिए शम-दम आदि अनुष्ठान करने चाहिए।
 
श्लोक 8:  इस सम्बन्ध में विद्वान पुरुष उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जो राजा सेनजित को उनके पास आये एक हितैषी ब्राह्मण ने दिया था ॥8॥
 
श्लोक 9:  राजा सेनजित का पुत्र मर गया था। वह शोक की अग्नि में जल रहा था। उसका मन शोक में डूबा हुआ था। राजा को शोकग्रस्त देखकर ब्राह्मण ने यह कहा-॥9॥
 
श्लोक 10:  राजन्! तुम मूर्खों की भाँति क्यों मोहग्रस्त हो रहे हो? तुम स्वयं शोक करने के योग्य हो, फिर दूसरों के लिए शोक क्यों करते हो? अरे! एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम्हारे लिए शोक करते हुए अन्य शोक करने वाले लोग भी वही दण्ड भोगेंगे॥ 10॥
 
श्लोक 11:  हे पृथ्वी के स्वामी! आप, मैं और आपके पास बैठे हुए अन्य लोग, सब लोग वहीं लौट जाएँगे जहाँ से आए हैं॥11॥
 
श्लोक 12:  सेनजित ने पूछा, "हे तप से संपन्न ब्राह्मण! आपके पास कौन सी बुद्धि, कौन सी तपस्या, कौन सी समाधि, कौन सा ज्ञान और कौन से शास्त्र हैं, कि उन्हें प्राप्त करने के बाद आपको किसी प्रकार का दुःख नहीं होता।"
 
श्लोक d1:  सुख-दुःख का चक्र घूमता रहता है। सुख में सुखी और दुःख में दुःखी हो जाता हूँ। ऐसी हालत में मुझे अपने लिए दुःख होता है। यह दुःख मेरे हृदय में बसा हुआ है।
 
श्लोक 13:  ब्राह्मण ने कहा-राजन्! देखो, इस संसार में उत्तम, मध्यम और नीच सभी प्राणी नाना प्रकार के कर्मों में आसक्त होकर दुःख भोग रहे हैं॥13॥
 
श्लोक d2:  मैं अकेला हूँ। न मैं किसी और का हूँ, न मैं किसी और का हूँ। न मैं जिसका हूँ, उसे देखता हूँ और न मैं उसे देखता हूँ जो मेरा है (न किसी को मुझसे स्नेह है, न मुझे किसी से स्नेह है)।
 
श्लोक 14:  न तो यह शरीर मेरा है और न ही यह सारी पृथ्वी। ये सभी वस्तुएँ जैसे मेरी हैं, वैसे ही दूसरों की भी हैं। ऐसा सोचकर मुझे इनके लिए कोई दुःख नहीं होता। ऐसा समझकर मुझे न तो सुख होता है और न दुःख।
 
श्लोक 15:  जैसे समुद्र में तैरते हुए लकड़ी के दो टुकड़े कभी-कभी एक-दूसरे से मिल जाते हैं और मिलने के बाद पुनः अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार इस संसार में प्राणी एक-दूसरे से मिल जाते हैं ॥15॥
 
श्लोक 16:  इसी प्रकार हमें पुत्र, पौत्र, सगे-संबंधी और मित्र भी मिलते हैं, उनमें कभी आसक्ति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि एक दिन उनसे वियोग अवश्यंभावी है॥16॥
 
श्लोक 17:  तुम्हारा पुत्र अज्ञात लोक से आया था और अब अज्ञात लोक में चला गया है। न तो वह तुम्हें जानता था और न तुम उसे जानती थीं; फिर तुम कौन हो जो उसका शोक मना रहे हो?॥17॥
 
श्लोक 18:  विषयों की तृष्णा के कारण संसार में जो चिन्ता होती है, उसे दुःख कहते हैं और उस दुःख का नाश सुख है। उस सुख के बाद (पुनः तृष्णा से उत्पन्न) दुःख होता है। इस प्रकार दुःख बार-बार होता रहता है। 18॥
 
श्लोक 19:  सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख आता है। मनुष्य का सुख-दुःख चक्र की भाँति घूमता रहता है। 19॥
 
श्लोक 20:  इस समय तुम सुख से दुःख में गए हो। अब तुम्हें पुनः सुख की प्राप्ति होगी। यहाँ किसी भी प्राणी को सदा सुख या दुःख नहीं मिलता।
 
श्लोक 21:  यह शरीर सुख का आधार है और दुःख का भी आधार है। जो मनुष्य अपने शरीर पर अभिमान करता है, वह अपने शरीर से जो भी कर्म करता है, उसके अनुसार सुख-दुःख का फल भोगता है ॥21॥
 
श्लोक 22:  यह जीवन शरीर के साथ ही स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। दोनों विभिन्न योनियों में साथ-साथ रहते हैं और साथ-साथ नष्ट हो जाते हैं ॥22॥
 
श्लोक 23:  मनुष्य नाना प्रकार के मोह-बंधनों में बँधे हुए हैं, इसलिए वे सदा विषय-भोगों की आसक्ति से घिरे रहते हैं; इसलिए जैसे रेत के बने पुल जल के वेग से बह जाते हैं, वैसे ही ऐसे मनुष्यों की विषय-वासनाएँ पूर्ण नहीं होतीं; जिससे वे दुःख भोगते रहते हैं॥ 23॥
 
श्लोक 24:  जैसे तेली तिलों को पीसकर तेल प्राप्त करते हैं, वैसे ही मोहवश ही सब लोग अज्ञानजनित दुःखों द्वारा सृष्टि चक्र में पिस रहे हैं ॥24॥
 
श्लोक 25:  मनुष्य अपनी स्त्री, पुत्र आदि तथा परिवार के लिए चोरी आदि पाप संचित करता है; परंतु इस लोक और परलोक में उन सब कर्मों का दुःखदायी फल उसे ही भोगना पड़ता है ॥25॥
 
श्लोक 26:  जो मनुष्य अपनी स्त्री, पुत्र और परिवार में आसक्त रहते हैं, वे दुःख के सागर में उसी प्रकार डूब जाते हैं, जैसे बूढ़े जंगली हाथी दलदल में फँसकर नष्ट हो जाते हैं ॥26॥
 
श्लोक 27:  हे प्रभु! यहाँ पुत्र, धन, परिवार और बन्धु-बान्धवों के नष्ट हो जाने पर सब लोग दावानल की तरह महान दुःख का अनुभव करते हैं; किन्तु सुख-दुःख, जन्म-मरण आदि सब भाग्य के अधीन हैं।
 
श्लोक 28:  मनुष्य के शुभचिंतक मित्र हों या न हों, वह मित्रों के साथ हो या शत्रुओं के साथ, वह बुद्धिमान हो या मूर्ख, उसे सुख तभी मिलता है जब ईश्वर उसके साथ होता है। 28.
 
श्लोक 29:  अन्यथा न तो मित्र सुख देने में समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देने में समर्थ हैं, न बुद्धि में धन देने की शक्ति है और न धन स्वयं सुख देने में समर्थ है।
 
श्लोक 30:  न तो बुद्धि धन प्राप्ति का कारण है, न मूर्खता दरिद्रता का कारण है, वस्तुतः ज्ञानी पुरुष ही संसार चक्र की गतिशीलता का विवरण जान सकता है, अन्य कोई नहीं ॥30॥
 
श्लोक 31:  बुद्धिमान, वीर, मूर्ख, कायर, गूंगा, विद्वान, कमजोर या बलवान, जो भी भाग्यशाली है - जिस पर भी भगवान कृपा करेंगे, उसे बिना किसी प्रयास के ही सुख प्राप्त होगा।
 
श्लोक 32:  दूध देने वाली गाय बछड़े की है, या दूध दुहने वाले ग्वाले की है, या उसे पालने वाले स्वामी की है, या उसे चुराने वाले चोर की है? वास्तव में गाय उसी की है जो उसका दूध पीता है - ऐसा विद्वानों का मत है ॥32॥
 
श्लोक 33:  इस संसार में केवल वे ही लोग सुखी हैं जो अत्यन्त मूर्ख हैं और जो बुद्धि से परे चले गए हैं। इनके बीच के सभी लोग दुःख पाते हैं॥ 33॥
 
श्लोक 34:  बुद्धिमान पुरुष अन्तिम अवस्था में आनन्दित होते हैं, मध्य अवस्था में नहीं। अन्तिम अवस्था की प्राप्ति सुखरूप कही गई है और उनके बीच की अवस्था दुःखरूप कही गई है। 34॥
 
श्लोक d3:  दुष्ट बुद्धि वाला मूर्ख मनुष्य अपने कर्मों के अच्छे-बुरे फल की चिंता न करके सुखपूर्वक सोता है; क्योंकि वह कम्बल से ढके हुए मनुष्य के समान महान अज्ञान से ढका रहता है।
 
श्लोक 35:  परंतु जो ज्ञानजन्य सुख से युक्त हैं, जो द्वंद्व से परे हैं और जिनमें ईर्ष्या नहीं है, वे शुभ-अशुभ भाग्य से कभी पीड़ित नहीं होते ॥ 35॥
 
श्लोक 36:  जो लोग अज्ञान से ऊपर उठ गए हैं, परन्तु ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, वे सुख की स्थिति आने पर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और दुःख की स्थिति आने पर अत्यन्त दुःख का अनुभव करते हैं ॥ 36॥
 
श्लोक 37:  मूर्ख मनुष्य स्वर्ग के देवताओं की भाँति सदैव विषय-भोगों में लिप्त रहते हैं; क्योंकि उनका मन विषय-आसक्ति के दलदल में डूब जाता है और मोहग्रस्त हो जाता है।
 
श्लोक 38:  आलस्य प्रारम्भ में सुख के समान प्रतीत होता है; किन्तु अन्त में दुःख देता है और कार्य में कुशलता दुःख के समान प्रतीत होती है; किन्तु सुख का उत्पादक है। लक्ष्मी सहित धन कुशल मनुष्य में ही रहता है, आलसी में नहीं ॥38॥
 
श्लोक 39:  अतः बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि जो कुछ भी मिले, चाहे वह सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, उसका स्वागत करे और कभी साहस न हारे ॥39॥
 
श्लोक 40:  दुःख के हजारों स्थान हैं और भय के सैकड़ों स्थान हैं; परन्तु वे प्रतिदिन मूर्खों को ही प्रभावित करते हैं, विद्वानों को नहीं ॥40॥
 
श्लोक 41:  जो बुद्धिमान, सुशील और शिक्षित मन वाला है, जो आध्यात्मिक शास्त्रों के श्रवण में रुचि रखता है, जो किसी के दोष नहीं देखता, जो अपने मन को वश में रखता है और जिसकी इन्द्रियाँ बलवान हैं, उसे दुःख कभी छू नहीं सकता ॥41॥
 
श्लोक 42:  विद्वान पुरुष को चाहिए कि इस विचार का आश्रय लेकर काम, क्रोध आदि शत्रुओं से अपने मन की रक्षा करते हुए उत्तम आचरण करे। जो सृष्टि और संहार के तत्त्व को जानता है, उसे दुःख छू भी नहीं सकता ॥ 42॥
 
श्लोक 43:  जो वस्तु दुःख, पीड़ा या कष्ट का कारण बनती है, अथवा जो अत्यधिक परिश्रम कराती है, चाहे वह उस दुःख का मूल कारण ही क्यों न हो, चाहे वह शरीर का कोई अंग ही क्यों न हो, उसे त्याग देना चाहिए ॥43॥
 
श्लोक 44:  जब मनुष्य किसी वस्तु में आसक्ति उत्पन्न कर लेता है, तब वे सभी वस्तुएँ उसके दुःख का कारण बन जाती हैं ॥ 44॥
 
श्लोक 45:  वह जिस किसी कामना का त्याग कर देता है, वही उसके सुख का कारण बन जाती है। जो मनुष्य कामनाओं का अनुसरण करता है, वह उनसे नष्ट हो जाता है ॥ 45॥
 
श्लोक 46:  इस लोक के सुख और स्वर्ग के महान सुख मिलकर भी उस सुख के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हैं जो कामनाओं के निरोध से प्राप्त होता है ॥ 46॥
 
श्लोक 47:  मनुष्य चाहे बुद्धिमान हो, मूर्ख हो या शूरवीर हो, उसे पूर्वजन्म में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥47॥
 
श्लोक 48:  इस प्रकार जीव बार-बार सुखद और अप्रिय पदार्थों का, सुख और दुःख का अनुभव करते रहते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥48॥
 
श्लोक 49:  ऐसी बुद्धि का आश्रय लेकर कामनाओं का त्याग करने वाले गुण से युक्त पुरुष सुखपूर्वक रहता है; अतः उसे सभी प्रकार के सुखों से विरक्त होकर उनसे विमुख हो जाना चाहिए, अर्थात् उनसे विमुख हो जाना चाहिए ॥ 49॥
 
श्लोक 50:  हृदय से उत्पन्न यह कामना हृदय में ही दृढ़ होकर मृत्यु का रूप धारण कर लेती है। क्योंकि (जब इसकी सिद्धि में कोई बाधा आती है, तब) इसे जीवों के शरीर में क्रोध के नाम से विद्वान लोग कहते हैं ॥50॥
 
श्लोक 51:  जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह जीव अपनी समस्त इच्छाओं को समेट लेता है, तब यह अपने शुद्ध अन्तःकरण में स्वयं प्रकाशस्वरूप परब्रह्म को अनुभव करता है ॥ 51॥
 
श्लोक 52:  जब वह किसी से नहीं डरता और न कोई उससे डरता है; तथा जब वह न किसी वस्तु की इच्छा करता है और न उससे द्वेष करता है, तब वह परम ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ॥ 52॥
 
श्लोक 53:  जब साधक सत्य और असत्य अर्थात् संसार के व्यक्त और अव्यक्त पदार्थ, दुःख और सुख, भय और अभय, प्रिय और अप्रिय आदि समस्त द्वन्द्वों को त्याग देता है, तब उसका मन शान्त हो जाता है ॥ 53॥
 
श्लोक 54:  जब धीर और ज्ञानी पुरुष मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति पापपूर्ण आचरण नहीं करता, तब वह परम पुरुष को प्राप्त होता है ॥54॥
 
श्लोक 55:  जो वस्तु वृद्ध होने पर भी कभी पुरानी नहीं होती तथा जो रोग के समान जीवन के साथ-साथ रहती है, उसे छोड़ना मिथ्या बुद्धि वालों के लिए कठिन है; जो इस इच्छा को त्याग देता है, वही सुख प्राप्त करता है ॥ 55॥
 
श्लोक 56:  राजन् ! इस विषय में पिंगला द्वारा गायी गई कथाएँ कही जाती हैं, जिनका पालन करके उसने संकटकाल में भी सनातन धर्म को प्राप्त किया था ॥ 56॥
 
श्लोक 57:  एक बार पिंगला नामक वेश्या बहुत देर तक एक निश्चित स्थान पर बैठी रही, फिर भी उसका प्रिय उसके पास नहीं आया; इससे उसे बड़ा दुःख हुआ; फिर भी वह शान्त रही और इस प्रकार सोचने लगी।
 
श्लोक 58:  पिंगला बोली, "मेरा सच्चा प्रियतम बहुत समय से मेरे पास ही रहता है। मैं सदैव उसके साथ ही रहती आई हूँ। वह कभी पागल नहीं होता; किन्तु मैं इतनी मदहोश थी कि आज से पहले उसे पहचान ही नहीं सकी।"
 
श्लोक 59:  आज से मैं उस शरीर को, जिसमें केवल एक स्तंभ और नौ द्वार हैं, दूसरों के लिए बंद कर दूँगी। यह जानते हुए भी कि सच्चा प्रियतम यहाँ आ रहा है, कौन स्त्री हाड़-मांस के पुतले को अपना प्रियतम मानेगी?
 
श्लोक 60:  अब मैं मोहरूपी निद्रा से जाग गया हूँ और निरन्तर जागृत हूँ - मैंने कामनाओं का भी त्याग कर दिया है। अतः वे धूर्त नरकरूपी पुरुष अब कामनारूप धारण करके मुझे धोखा नहीं दे सकेंगे ॥60॥
 
श्लोक 61:  कभी-कभी भाग्यवश या पूर्व शुभ कर्मों के प्रभाव से अनर्थ भी अर्थ में बदल जाता है, जिससे आज मैं निराश होकर सद्ज्ञान से युक्त हो गया हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रहा। 61॥
 
श्लोक 62:  वास्तव में, चैन की नींद वही सोता है जिसे किसी भी प्रकार की आशा नहीं होती। आशा का न होना ही परम सुख है। देखो, आशा को निराशा में बदलकर पिंगला चैन की नींद सोने लगी। 62.
 
श्लोक 63:  भीष्म कहते हैं - हे राजन! ब्राह्मण के कहे हुए उपर्युक्त तथा अन्य युक्तिसंगत वचनों से राजा सेनजित का मन स्थिर हो गया। वह अपना शोक छोड़कर सुखी हो गया और सुखपूर्वक रहने लगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)