श्लोक 1: भीष्मजी कहते हैं - राजन ! तत्पश्चात विरुपाक्ष ने बकराज के लिए चिता तैयार करवाई, उसे अनेक रत्नों, सुगन्धित चन्दन और वस्त्रों से सजाया गया ॥1॥
श्लोक 2: तत्पश्चात् उस पर बकरे के मृत शरीर को रखकर महाबली राक्षसराज ने उसमें आग लगा दी और विधिपूर्वक अपने मित्र का अंतिम संस्कार कर दिया॥2॥
श्लोक 3: उसी समय दिव्य धनु दक्षकन्या सुरभिदेवी वहां आईं और आकाश में चिता के ठीक ऊपर खड़ी हो गईं।
श्लोक 4: हे पापरहित! उसके मुख से निकला हुआ दूध-मिश्रित झाग राजा धर्म की चिता पर गिरा।
श्लोक 5: हे भोले राजा! उसी क्षण राजा बकरा जीवित हो उठा और विरुपाक्ष से मिलने के लिए उड़ चला।
श्लोक 6: उसी समय देवराज इन्द्र विरुपाक्ष के नगर में आये और विरुपाक्ष से इस प्रकार बोले - ‘यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारे द्वारा बकराज को जीवन मिला ॥’॥
श्लोक 7: इन्द्र ने विरुपाक्ष को एक प्राचीन घटना सुनाई, जिसके अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पहले राजधर्म को शाप दिया था।
श्लोक 8: हे राजन! एक बार जब बकरों का राजा ब्रह्माजी के दरबार में नहीं पहुँच सका, तब पितामह ने अत्यन्त क्रोधित होकर पक्षीराज को शाप दे दिया और कहा -॥8॥
श्लोक 9: वह मूर्ख और नीच बगुला मेरे दरबार में नहीं आया है; इसलिए शीघ्र ही उस दुष्टात्मा को मारे जाने का दुःख भोगना पड़ेगा।॥9॥
श्लोक 10: ब्रह्माजी के वचनों के कारण गौतम ने उसे मार डाला और ब्रह्माजी ने ही पुनः राजधर्मा पर अमृत छिड़ककर उसे जीवनदान दिया ॥10॥
श्लोक 11-12h: तत्पश्चात् राजधर्मा बाकने इन्द्र को प्रणाम करके बोले - 'सुरेश्वर! यदि आपकी मुझ पर कृपा है तो कृपया मेरे प्रिय मित्र गौतम को भी जीवित कर दीजिए।' 11 1/2॥
श्लोक 12-13h: हे महापुरुष! उनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान इंद्र ने गौतम ब्राह्मण पर अमृत छिड़ककर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।
श्लोक 13-14h: राजन! प्रिय मित्र गौतम को बर्तन और स्वर्ण आदि सहित पाकर बकराज ने बड़े प्रेम से हृदय में उनका आलिंगन किया। 13 1/2॥
श्लोक 14-15h: तत्पश्चात् बकरों के राजा ने पापी को उसके धन सहित विदा किया और उसके घर में प्रवेश किया।
श्लोक 15-16h: तदनन्तर बकराज विधिपूर्वक ब्रह्माजी की सभा में गया और ब्रह्माजी ने उस महात्मा का आतिथ्य किया ॥15 1/2॥
श्लोक 16: गौतम पुनः भीलों के गाँव में रहने चले गए और वहाँ उस शूद्रा स्त्री के गर्भ से उन्होंने बहुत से पापी पुत्रों को जन्म दिया॥16॥
श्लोक 17-18h: तब देवताओं ने गौतम को शाप देते हुए कहा, 'यह पापी कृतघ्न है और दीर्घकाल से एक शूद्र जाति की स्त्री, जिसने अन्य पति स्वीकार कर लिया है, के गर्भ से सन्तान उत्पन्न कर रहा है। इस पाप के कारण इसे घोर नरक में भेजा जाएगा।'
श्लोक 18-19: भरत! महर्षि नारद ने पूर्वकाल में मुझे यह सम्पूर्ण घटना सुनाई थी। हे भरतश्रेष्ठ! इस महान कथा का स्मरण करके मैंने तुम्हें यथार्थ रूप में सब कुछ कह सुनाया है।
श्लोक 20: कृतघ्न व्यक्ति यश कैसे प्राप्त कर सकता है? वह पद और सुख कैसे प्राप्त कर सकता है? कृतघ्न व्यक्ति विश्वास के योग्य नहीं होता। कृतघ्न व्यक्ति के उद्धार के लिए शास्त्रों में कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया है।
श्लोक 21: मनुष्य को विशेष ध्यान रखना चाहिए और विश्वासघात के पाप से बचना चाहिए। जो व्यक्ति अपने मित्र के साथ विश्वासघात करता है, वह अनंत काल तक नरक में जाता है। 21॥
श्लोक 22: प्रत्येक व्यक्ति को सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए तथा मित्र की इच्छा रखनी चाहिए; क्योंकि मित्र से सब कुछ प्राप्त होता है। सम्मान सदैव मित्र के सहयोग से प्राप्त होता है।
श्लोक 23: मित्र की सहायता से सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है तथा मित्र के माध्यम से कष्टों से मुक्ति भी मिलती है। अतः बुद्धिमान व्यक्ति को अपने मित्र का आदरपूर्वक पूजन करना चाहिए।
श्लोक 24: जो पापी, कृतघ्न, निर्लज्ज, मित्रों का द्रोही, दुष्ट और पापी हो, ऐसे नीच पुरुष का विद्वान पुरुष को सदैव त्याग कर देना चाहिए ॥24॥
श्लोक 25: हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक पापी, मित्रों के प्रति द्रोही और कृतघ्न मनुष्य से परिचित कराया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥25॥
श्लोक 26: वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! भीष्म पितामह के ये वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मन में अत्यन्त प्रसन्न हुए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥