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mahabharat 12.172.20-22h: महाराज! उन रात्रिचर जीवों ने दैत्यराज से कहा - 'प्रभु! इस दुष्ट का मांस डाकुओं को दे देना चाहिए, कृपया इसका पाप हमें खाने को न दें।' इस प्रकार सभी दैत्यों ने दैत्यराज के चरणों पर सिर रखकर प्रार्थना की।   |   mahabharat अध्याय 12.172: कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 172: कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना  »  श्लोक 20-22h
 
 
श्लोक  12.172.20-22h 
दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधम:॥ २०॥
इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचरा:।
शिरोभि: प्रणता: सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम्॥ २१॥
न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायास्य किल्बिषम्।
 
 
अनुवाद
महाराज! उन रात्रिचर जीवों ने दैत्यराज से कहा - 'प्रभु! इस दुष्ट का मांस डाकुओं को दे देना चाहिए, कृपया इसका पाप हमें खाने को न दें।' इस प्रकार सभी दैत्यों ने दैत्यराज के चरणों पर सिर रखकर प्रार्थना की।
 
Maharaj! Those night creatures said to the King of Demons - 'Prabhu! The flesh of this wretch should be given to the bandits, please do not give us his sin to eat.' In this way all the demons prayed with their heads at the feet of the King of Demons. 20-21 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)