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mahabharat 12.171.9-10: आज कार्तिक पूर्णिमा है। इस दिन मेरे यहाँ हज़ारों श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करेंगे। यह भी उनके बीच भोजन करेगा, और इसे भी उनके साथ धन दिया जाना चाहिए। आज का दिन पवित्र है, यह ब्राह्मण यहाँ अतिथि बनकर आया है और मैंने धन दान का संकल्प कर लिया है। अब इसके बाद मुझे क्या सोचना चाहिए?'   |   mahabharat अध्याय 12.171: गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 171: गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  12.171.9-10 
कार्तिक्यामद्य भोक्तार: सहस्रं मे द्विजोत्तमा:।
तत्रायमपि भोक्ता च देयमस्मै च मे धनम्॥ ९॥
स चाद्य दिवस: पुण्यो ह्यतिथिश्चायमागत:।
संकल्पितं चैव धनं किं विचार्यमत: परम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
आज कार्तिक पूर्णिमा है। इस दिन मेरे यहाँ हज़ारों श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करेंगे। यह भी उनके बीच भोजन करेगा, और इसे भी उनके साथ धन दिया जाना चाहिए। आज का दिन पवित्र है, यह ब्राह्मण यहाँ अतिथि बनकर आया है और मैंने धन दान का संकल्प कर लिया है। अब इसके बाद मुझे क्या सोचना चाहिए?'
 
'Today is the full moon day of Kartik. On this day thousands of great Brahmins will eat at my place. He will also eat among them, he should also be given money along with them. Today is a holy day, this Brahmin has come here as a guest and I have already resolved to donate money. Now what should I think after this?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)