श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 171: गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना  »  श्लोक 33-35
 
 
श्लोक  12.171.33-35 
किं कृत्वा धारयेयं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तयत्।
तत: स पथि भोक्तव्यं प्रेक्षमाणो न किंचन॥ ३३॥
कृतघ्न: पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत्।
अयं बकपति: पार्श्वे मांसराशि: स्थितो महान्॥ ३४॥
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
अब मैं अपने प्राण बचाने के लिए क्या उपाय करूँ? ऐसे विचारों में वह खो गया। हे नरसिंह! फिर मार्ग में कुछ भी खाने को न पाकर उस कृतघ्न ने मन ही मन सोचा, 'यह बगुलों का राजा राजधर्म मेरे पास ही है। यह मांस का बहुत बड़ा ढेर है। इसे मारकर ले जाऊँ और शीघ्र ही यहाँ से चला जाऊँ।'॥33-35॥
 
‘Now what means will I adopt to save my life?’ He got lost in such thoughts. O lion of men! Then, not finding anything to eat on the way, that ungrateful man thought to himself, ‘This king of herons, Rajdharma, is right beside me. This is a very large heap of meat. I should kill this and take it and leave this place quickly.’॥ 33-35॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)