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श्लोक  12.17.8 
योग: क्षेमश्च राष्ट्रस्य धर्माधर्मौ त्वयि स्थितौ।
मुच्यस्व महतो भारात् त्यागमेवाभिसंश्रय॥ ८॥
 
 
अनुवाद
राष्ट्र का कल्याण और कल्याण, धर्म और अधर्म, सब आपमें ही निहित हैं। इस महान् भार से मुक्त होकर त्याग की शरण में जाइए। 8.
 
The welfare and well-being of the nation, Dharma and Adharma, all reside in you. Free yourself from this great burden and take refuge in renunciation. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)