श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 169: गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.169.5 
स तु सार्थपरिभ्रष्टस्तस्माद् देशात् तथा च्युत:।
एकाकी व्यचरत् तत्र वने किंपुरुषो यथा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वह वणिकों के समूह को छोड़कर उस देश से भी विमुख होकर उस वन में अकेला ही विचरण करने लगा, मानो कोई किम्पुरुष विचरण कर रहा हो ॥5॥
 
He left the group of traders and thus, being estranged from that land also, he started wandering alone in that forest, as if a Kimpurusha was roaming about. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)