श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.168.49 
स एवमुक्त: सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा।
प्रत्युवाच ततो राजन् विनिश्चित्य तदार्तवत् ॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
राजा! अपने हितैषी मित्र की यह बात सुनकर गौतम ने मन ही मन निश्चय करके दुःखी स्वर में कहा-॥49॥
 
King! On hearing his well-wisher friend say this, Gautam, after making up his mind, said in a sad tone -॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)