श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.168.46 
किमिदं कुरुषे मोहाद् विप्रस्त्वं हि कुलोद्वह:।
मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गत: कथम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
अरे ! तुम आसक्तिवश क्या कर रहे हो ? तुम तो मध्यदेश के प्रसिद्ध और कुलीन ब्राह्मण थे । फिर यहाँ डाकू कैसे बन गए ?॥ 46॥
 
'Hey! What are you doing out of attachment? You were a famous and noble Brahmin of Madhyadesh. How did you become a dacoit here?॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)