श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  12.168.44-45 
चक्राङ्गभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम्।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम्॥ ४४॥
तं दृष्ट्वा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षयागतम्।
अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने देखा कि गौतम के कंधे पर हंस का शव है, हाथ में धनुष-बाण है, सारा शरीर रक्त से लथपथ है, घर के द्वार पर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षस के समान दिखाई दे रहा है; और उसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है। उसे इस अवस्था में घर आया देखकर ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया। उसे पहचानकर वह अत्यन्त लज्जित हुआ और उससे इस प्रकार बोला -॥44-45॥
 
The Brahmin saw that Gautama had the dead body of a swan on his shoulder, he had a bow and arrow in his hand, his whole body was soaked in blood, Gautama who had come to the door of the house looked like a cannibalistic demon; and had lost his brahminhood. Seeing him come home in this state, the Brahmin recognised him. On recognising him, he felt very ashamed and spoke to him thus -॥44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)