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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ
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श्लोक 42
श्लोक
12.168.42
स तु विप्रगृहान्वेषी शूद्रान्नपरिवर्जक:।
ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत् सर्वतोदिशम्॥ ४२॥
अनुवाद
वह शूद्र का अन्न नहीं खाता था, इसलिए वह डाकुओं से भरे हुए पूरे गांव में घूम-घूम कर ब्राह्मण का घर ढूंढ़ने लगा।
He would not eat the food of a Shudra; so he began to roam all over the village infested with bandits, looking for a Brahmin's house. 42.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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