श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.168.4 
दुर्लभो हि सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हित: सुहृत् ।
एतद् धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वं व्याख्यातुमर्हसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हितकारी बात सुनने वाला दयालु हृदय दुर्लभ है और हितकारी मित्रवत हृदय उससे भी दुर्लभ है। पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ पितामह! आपको इन सभी प्रश्नों का विस्तार से विश्लेषण करना चाहिए।
 
A kind hearted person who listens to what is beneficial is rare and a friendly heart that does good is even rarer. The best grandfather among the righteous souls! You should analyze all these questions in detail.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)