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mahabharat 12.168.3: मेरा मानना ​​है कि जहाँ मित्र खड़े होते हैं, वहाँ न तो धन की अधिकता रहती है और न ही सगे-संबंधी और मित्र ही टिक पाते हैं ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.168.3 
न हि तत्र धनं स्फीतं न च सम्बन्धिबान्धवा:।
तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मेरा मानना ​​है कि जहाँ मित्र खड़े होते हैं, वहाँ न तो धन की अधिकता रहती है और न ही सगे-संबंधी और मित्र ही टिक पाते हैं ॥3॥
 
I believe that where friends stand, neither abundance of wealth nor relatives and friends can stay there. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)