श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  12.168.26-27 
ये च दोषसमायुक्ता नरा: प्रोक्ता मयानघ॥ २६॥
तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातका:।
त्यक्तव्यास्तु दुराचारा: सर्वेषामिति निश्चय:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप राजन! मैंने जितने भी दुष्ट लोगों का वर्णन किया है, उनमें सबसे अधिक कृतघ्न लोग ही निकृष्ट हैं। वे अपने मित्रों की भी हत्या कर देते हैं। ऐसे दुष्ट और दुराचारी लोगों से दूर ही रहना चाहिए। यही सबका विश्वास है। 26-27।
 
O sinless king! Of all the faulty people I have described, the most ungrateful are the worst. They even kill their friends. Such wicked and evil-doers should be avoided from a distance. This is the belief of all. 26-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)