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mahabharat 12.167.51: धर्मपुत्र महामना युधिष्ठिर ने भी उन समस्त विश्वसनीय राजाओं और सम्बन्धियों की प्रशंसा की और पुनः उदार गंगानन्दन भीष्मजी के पास आकर उनसे उत्तम धर्म के विषय में पूछा ॥51॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.167.51 
स चापि तान् धर्मसुतो महामना-
स्तदा प्रतीतान् प्रशशंस वीर्यवान्।
पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतं
तत: परं धर्ममहीनचेतसम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
धर्मपुत्र महामना युधिष्ठिर ने भी उन समस्त विश्वसनीय राजाओं और सम्बन्धियों की प्रशंसा की और पुनः उदार गंगानन्दन भीष्मजी के पास आकर उनसे उत्तम धर्म के विषय में पूछा ॥51॥
 
The mighty son of Dharma, Mahamana Yudhishthir also praised all those trustworthy kings and relatives and again came to the generous Ganganandan Bhishmaji and asked him about the best religion. 51॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षड्जगीतायां सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें षड्जगीताविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)