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mahabharat 12.167.50: हे जनमेजय! युधिष्ठिर की वाणी में कोई दोष नहीं था। वह अत्यंत सुंदर वाणी और विविध व्यंजनों से सुशोभित थी तथा हृदय को प्रसन्न करने वाली थी। उसे सुनकर समस्त राजाओं ने युधिष्ठिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.167.50 
सुचारुवर्णाक्षरचारुभूषितां
मनोनुगां निर्धुतवाक्यकण्टकाम्।
निशम्य तां पार्थिव पार्थभाषितां
गिरं नरेन्द्रा: प्रशशंसुरेव ते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे जनमेजय! युधिष्ठिर की वाणी में कोई दोष नहीं था। वह अत्यंत सुंदर वाणी और विविध व्यंजनों से सुशोभित थी तथा हृदय को प्रसन्न करने वाली थी। उसे सुनकर समस्त राजाओं ने युधिष्ठिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥50॥
 
O Janamejaya! There was no fault in Yudhishthira's speech. It was adorned with a very beautiful voice and a rich combination of consonants and was pleasing to the heart. On hearing it, all the kings praised Yudhishthira profusely. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)