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mahabharat 12.167.4: तब अर्थ की गति और तत्त्व को जानने वाले तेजस्वी आत्मा विदुर जी ने धर्मग्रंथों को स्मरण करके सबसे पहले बोलना आरम्भ किया॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.167.4 
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञ: प्रथमं प्रतिभानवान्।
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तब अर्थ की गति और तत्त्व को जानने वाले तेजस्वी आत्मा विदुर जी ने धर्मग्रंथों को स्मरण करके सबसे पहले बोलना आरम्भ किया॥4॥
 
Then Vidur ji, the brilliant soul who knew the speed and essence of meaning, remembered the religious texts and started speaking first. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)