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mahabharat 12.167.39: धर्मपुत्र! मैंने बहुत सोच-विचारकर यह निश्चय किया है। तुम्हें मेरे कथन के विषय में अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए। मेरे वचन अच्छे, कोमल, उत्तम, तुच्छता से रहित और सारगर्भित हैं; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी उन्हें ग्रहण कर सकते हैं॥ 39॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.167.39 
बुद्धिर्ममैषा परिखास्थितस्य
मा भूद् विचारस्तव धर्मपुत्र।
स्यात् संहितं सद्भिरफल्गुसारं
ममेति वाक्यं परमानृशंसम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
धर्मपुत्र! मैंने बहुत सोच-विचारकर यह निश्चय किया है। तुम्हें मेरे कथन के विषय में अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए। मेरे वचन अच्छे, कोमल, उत्तम, तुच्छता से रहित और सारगर्भित हैं; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी उन्हें ग्रहण कर सकते हैं॥ 39॥
 
Dharmaputra! I have decided this after deep deliberation. You should not think otherwise about my statement. My words are good, gentle, excellent, without triviality and full of essence; hence even the best men can accept them.॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)