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mahabharat 12.167.36: जैसे पुष्प का रस उसके मधु से श्रेष्ठ है, वैसे ही काम को धर्म और अर्थ से श्रेष्ठ माना गया है। काम ही धर्म और अर्थ का कारण है, अतः वह धर्म और अर्थ का स्वरूप है॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.167.36 
पुष्पतो मध्विव रस: काम आभ्यां तथा स्मृत:।
कामो धर्मार्थयोर्योनि: कामश्चाथ तदात्मक:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जैसे पुष्प का रस उसके मधु से श्रेष्ठ है, वैसे ही काम को धर्म और अर्थ से श्रेष्ठ माना गया है। काम ही धर्म और अर्थ का कारण है, अतः वह धर्म और अर्थ का स्वरूप है॥ 36॥
 
Just as the nectar of a flower is superior to its honey, similarly, lust is considered superior to Dharma and Artha. Lust is the cause of Dharma and Artha, hence it is the form of Dharma and Artha.॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)