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mahabharat 12.167.29: भीमसेन बोले- धर्मराज! जिसके मन में कोई कामना नहीं है, न धन कमाने की इच्छा है, न धर्म करने की। कामनारहित पुरुष काम (भोग) भी नहीं चाहता; इसलिए काम तीनों में श्रेष्ठ है॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.167.29 
भीमसेन उवाच
नाकाम: कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति।
नाकाम: कामयानोऽस्ति तस्मात् कामो विशिष्यते॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन बोले- धर्मराज! जिसके मन में कोई कामना नहीं है, न धन कमाने की इच्छा है, न धर्म करने की। कामनारहित पुरुष काम (भोग) भी नहीं चाहता; इसलिए काम तीनों में श्रेष्ठ है॥29॥
 
Bhimsen said-Dharmaraj! The one who has no desire in his mind, neither has the desire to earn money nor to do Dharma. A person without desire does not even want Kama (enjoyment); hence Kama is the greatest among the three.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)