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mahabharat 12.167.26: अतः मनुष्य को अपने मन को वश में करके अपने जीवन में धर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए तथा पहले धर्म का पालन करना चाहिए, उसके बाद ही धन की इच्छा करनी चाहिए; क्योंकि धर्माभिमानी पुरुष पर सभी जीव विश्वास करते हैं और जब सभी जीव उस पर विश्वास करने लगते हैं, तब मनुष्य के सभी कार्य स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.167.26 
तस्माद् धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थ: संयतात्मना।
विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अतः मनुष्य को अपने मन को वश में करके अपने जीवन में धर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए तथा पहले धर्म का पालन करना चाहिए, उसके बाद ही धन की इच्छा करनी चाहिए; क्योंकि धर्माभिमानी पुरुष पर सभी जीव विश्वास करते हैं और जब सभी जीव उस पर विश्वास करने लगते हैं, तब मनुष्य के सभी कार्य स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं॥ 26॥
 
Therefore, a man should control his mind and give priority to Dharma in his life and should first follow Dharma and then only seek wealth; because all living beings trust a Dharma-oriented person and when all living beings start trusting him, then all the tasks of a man are automatically accomplished.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)