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mahabharat 12.167.21: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात् धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण माद्री के पुत्र नकुल और सहदेव ने इस प्रकार अपने उत्तम विचार प्रस्तुत किए ॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.167.21 
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मार्थकुशलौ माद्रीपुत्रावनन्तरम्।
नकुल: सहदेवश्च वाक्यं जगदतु: परम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात् धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण माद्री के पुत्र नकुल और सहदेव ने इस प्रकार अपने उत्तम विचार प्रस्तुत किए ॥ 21॥
 
Vaishmpayana says: O King! Thereafter, Nakula and Sahadeva, the sons of Madri, who were proficient in the knowledge of Dharma and Artha, presented their excellent views in this manner. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)