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श्लोक 12.166.89  |
सर्वथैतदिदं श्रुत्वा खड्गसाधनमुत्तमम्।
लभते पुरुष: कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते॥ ८९॥ |
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| अनुवाद |
| इस उत्तम खड्गप्राप्तिका कथा को सब प्रकार से सुनकर मनुष्य इस लोक में यश प्राप्त करता है और शरीर त्यागने के पश्चात् शाश्वत सुख भोगता है ॥89॥ |
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| By listening to this excellent story of Khadgapraptika in every way, a man gets fame in this world and after leaving his body, he enjoys eternal happiness. 89॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि खड्गोत्पत्तिकथने षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें खड्गकी उत्पत्तिका कथनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८९ १/२ श्लोक हैं) |
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