श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 166: खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 7-9
 
 
श्लोक  12.166.7-9 
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमत:।
स तु कौशलसंयुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थसम्मतम्॥ ७॥
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम्।
शिक्षया चोपपन्नाय द्रोणशिष्याय भारत॥ ८॥
उवाच स तु धर्मज्ञो धनुर्वेदस्य पारग:।
शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतनन्दन! जनमेजय! माद्री के बुद्धिमान पुत्र नकुल का वह कथन न केवल कुशल था, अपितु सूक्ष्म एवं विचित्र अर्थ से युक्त भी था। यह सुनकर धनुर्वेद के निपुण विद्वान भीष्म, जो बाणों की शय्या पर सो रहे थे, सुन्दर वाणी और शब्दों द्वारा द्रोणाचार्य के महाज्ञानी शिष्य नकुल को इस प्रकार उत्तर देने लगे। 7-9॥
 
Vaishampayanji says – Bharatanandan! Janamejaya! That statement by Nakul, the intelligent son of Madri, was not only skillful but also full of subtle and strange meaning. Hearing this, Bhishma, an expert scholar of Dhanurveda, who was sleeping on the arrow bed, started replying to Nakula, the learned great-minded disciple of Drona, in a beautiful voice and words in this manner. 7-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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