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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 166: खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  12.166.57-58h 
छिन्दन् भिन्द न‍्‍‍रुजन् कृन्तन् दारयन् पोथयन्नपि॥ ५७॥
अचरद् वैरिसङ्घेषु दावाग्निरिव कक्षग:।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार सूखी लकड़ी और घास से उत्पन्न हुई दावानल वन के सभी वृक्षों को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान रुद्र शत्रु समूह के बीच विचरण करते हुए राक्षसों को मारते, काटते, चीरते, घायल करते, छेदते, चीरते और नष्ट करते रहे।
 
Just as a forest fire starting from dry wood and grass burns down all the trees in the forest, similarly Lord Rudra moved among the enemy group, killing, cutting, ripping, wounding, piercing, ripping and destroying the demons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)