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न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत।
त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधु: प्रजा:॥ ३०॥
अनुवाद
हे भरतपुत्र! उसे न तो जीवों से प्रेम था और न ही उन पर दया। वह साम, दाम और भेद तीनों ही तरीकों से आगे बढ़कर केवल दण्ड द्वारा ही समस्त प्रजा को पीड़ा पहुँचाने लगा।
O son of Bharat! He neither loved the living beings nor had any compassion for them. He went beyond all the three methods of Sama, Daam and Bhed and started tormenting all the subjects only by punishment. 30.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥