श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 165: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.165.57 
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गा:।
शूद्रं हत्वाब्दमेवैकमृषभं च शतं च गा:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यदि वह किसी वैश्य का वध करे, तो उसे दो वर्ष तक पूर्वोक्त नियमों के अनुसार रहकर सौ बैल और सौ गौएँ दान करनी चाहिए। और यदि वह किसी शूद्र का वध करे, तो उसे एक वर्ष तक पूर्वोक्त नियमों के अनुसार रहकर एक बैल और सौ गौएँ दान करनी चाहिए। ॥57॥
 
If he kills a Vaishya, then after living according to the aforesaid rules for two years, he should donate one hundred bulls and one hundred cows. And if he kills a Shudra, the murderer should live according to the aforesaid rules for one year and then donate one bull and one hundred cows. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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