| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 165: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन » श्लोक 52 |
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| | | | श्लोक 12.165.52  | अश्वमेधेन वापीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा।
अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते॥ ५२॥ | | | | | | अनुवाद | | अथवा अश्वमेध्य यज्ञ, गोसव यज्ञ अथवा अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा यज्ञ को भलीभाँति सम्पन्न करके वह इस लोक और परलोक में पूजित होता है ॥52॥ | | | | Or by performing the Yagya well through Ashwamedhya Yagya, Gosava Yagya or Agnishtom Yagya, he is worshiped in this world and the next world. 52॥ | | ✨ ai-generated | | |
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