श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 165: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.165.52 
अश्वमेधेन वापीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा।
अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
अथवा अश्वमेध्य यज्ञ, गोसव यज्ञ अथवा अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा यज्ञ को भलीभाँति सम्पन्न करके वह इस लोक और परलोक में पूजित होता है ॥52॥
 
Or by performing the Yagya well through Ashwamedhya Yagya, Gosava Yagya or Agnishtom Yagya, he is worshiped in this world and the next world. 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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