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श्लोक 12.165.44  |
वर्षाणां हि शतं तावत् प्रतिष्ठां नाधिगच्छति।
सहस्रं चैव वर्षाणां निपत्य नरकं वसेत् ॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| सौ वर्षों तक उसे प्रेत बनकर भटकना पड़ता है, कहीं भी रहने को स्थान नहीं मिलता। फिर एक हजार वर्षों तक उसे नरक में रहना पड़ता है ॥44॥ |
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| For a hundred years he has to wander like a ghost, he does not find a place to stay anywhere. Then he has to live in hell for a thousand years. ॥ 44॥ |
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