| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 165: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन » श्लोक 37 |
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| | | | श्लोक 12.165.37  | संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।
याजनाध्यापनाद् यौनान्न तु यानासनाशनात्॥ ३७॥ | | | | | | अनुवाद | | पतित पुरुष के साथ रहने से, उसके लिए यज्ञ करने से और उसे शिक्षा देने से मनुष्य एक वर्ष में ही पतित हो जाता है; परंतु अपनी संतान का विवाह उसकी संतान के साथ करने से, एक ही वाहन पर चढ़ने से, एक ही आसन पर बैठने से और उसके साथ भोजन करने से मनुष्य तुरंत ही पतित हो जाता है, एक वर्ष में नहीं ॥37॥ | | | | By living with a fallen person, by performing a sacrifice for him and by teaching him, a man becomes fallen within a year; however, by marrying one's own children with his children, by riding on the same vehicle or sitting on the same seat and by eating with him, he becomes fallen immediately, not in a year. ॥ 37॥ | | ✨ ai-generated | | |
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