Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.164.4-7: भीष्मजी बोले- राजन्! जिसके मन में घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसा पर आधारित दुष्ट कर्म करना चाहता है, जो स्वयं दूसरों की निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन्दा करते हैं, जो अपने को ईश्वर से वंचित मानता है और पापों में प्रवृत्त रहता है, जो अपने दिए हुए दानों का बार-बार बखान करता है, जिसका मन असमानता से भरा है, जो नीच कर्म करता है, दूसरों की आजीविका नष्ट करता है और बेईमान है, उपभोग की वस्तुओं को दूसरों को दिए बिना अकेले ही भोगता है, जो अभिमान से भरा है, जो सांसारिक सुखों में आसक्त है और अपनी प्रशंसा के लिए अनावश्यक बढ़ा-चढ़ाकर बोलता है, जिसका मन सबके प्रति शंकालु रहता है, जो कौए के समान भ्रामक दृष्टि रखता है, जो कृपणता से भरा है, जो अपने ही वर्ग के लोगों की प्रशंसा करता है, आश्रमों के प्रति सदैव द्वेष रखता है और जाति-पाँति फैलाता है, जो सदैव हिंसा के लिए घूमता रहता है, जो गुणों को भी दुर्गुण मानता है और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मन में संसार का भय रहता है, जिसके मन में कृपणता का भाव गहरा है, जो अपने ही वर्ग के लोगों की प्रशंसा करता है, आश्रमों के प्रति सदैव द्वेष रखता है और जाति-पाँति फैलाता है। जो जाति-पाँति में घुलने-मिलने वाला, सदैव हिंसा करने के लिए ही घूमता रहता है, जो गुणों को भी अवगुण मानता है और बहुत झूठ बोलता है, जो लोभी है और जिसमें उदारता का अभाव है, वह क्रूर कर्म करने वाला कहा गया है। 4-7 | mahabharat अध्याय 12.164: नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भीष्मजी बोले- राजन्! जिसके मन में घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसा पर आधारित दुष्ट कर्म करना चाहता है, जो स्वयं दूसरों की निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन्दा करते हैं, जो अपने को ईश्वर से वंचित मानता है और पापों में प्रवृत्त रहता है, जो अपने दिए हुए दानों का बार-बार बखान करता है, जिसका मन असमानता से भरा है, जो नीच कर्म करता है, दूसरों की आजीविका नष्ट करता है और बेईमान है, उपभोग की वस्तुओं को दूसरों को दिए बिना अकेले ही भोगता है, जो अभिमान से भरा है, जो सांसारिक सुखों में आसक्त है और अपनी प्रशंसा के लिए अनावश्यक बढ़ा-चढ़ाकर बोलता है, जिसका मन सबके प्रति शंकालु रहता है, जो कौए के समान भ्रामक दृष्टि रखता है, जो कृपणता से भरा है, जो अपने ही वर्ग के लोगों की प्रशंसा करता है, आश्रमों के प्रति सदैव द्वेष रखता है और जाति-पाँति फैलाता है, जो सदैव हिंसा के लिए घूमता रहता है, जो गुणों को भी दुर्गुण मानता है और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मन में संसार का भय रहता है, जिसके मन में कृपणता का भाव गहरा है, जो अपने ही वर्ग के लोगों की प्रशंसा करता है, आश्रमों के प्रति सदैव द्वेष रखता है और जाति-पाँति फैलाता है। जो जाति-पाँति में घुलने-मिलने वाला, सदैव हिंसा करने के लिए ही घूमता रहता है, जो गुणों को भी अवगुण मानता है और बहुत झूठ बोलता है, जो लोभी है और जिसमें उदारता का अभाव है, वह क्रूर कर्म करने वाला कहा गया है। 4-7
Bhishmaji said – King! In whose mind resides disgusting desires, who wants to start wicked deeds based on violence, who himself criticizes others and others criticize him, who considers himself deprived of God and is inclined towards sins, who repeatedly boasts about the gifts given to him, whose mind is full of inequality, who does mean deeds, destroys the livelihood of others and is dishonest, enjoys the things meant for consumption alone without giving them to others, who is full of pride, who is attached to worldly pleasures and unnecessarily exaggerates for his own praise, whose mind remains suspicious towards everyone, who has a deceptive view like a crow, who is filled with miserliness, who praises the people of his own class, always has enmity towards the ashrams and spreads caste-mixing, who always roams around for violence, who considers even virtues as vices and tells many lies, in whose mind there is a fear of the world, who has a deep feeling of miserliness, who praises the people of his own class, always has enmity towards the ashrams and spreads caste-mixing, who always roams around for violence, who considers even virtues as vices and tells many lies, A person who is greedy and lacks generosity is said to be one who commits cruel deeds. 4-7
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥